हम सब अंधविश्वासी हैं और रहेंगे अगर सरल भाषा में कहें तो अंधविश्वास किसी भी चीज़ पर आँखें बंद करके विश्वास कर लेने को कहा जाता है। किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना पर बिना उसके सत्य की जाँच किए या अपनी तार्किक बुद्धि का इस्तेमाल किए बिना बस उसे मान लेना ही अंधविश्वास है। अब अगर थोड़ी कठिन भाषा में कहें तो — हर वो चीज़ जिसकी वजह आपको पता नहीं है या जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, वह अंधविश्वास है। भले ही वो सही क्यों न हो, फिर भी वह अंधविश्वास ही है। हाँ, यह ज़रूर हो सकता है कि एक व्यक्ति के लिए वह विश्वास हो और वही चीज़ दूसरे व्यक्ति के लिए अंधविश्वास। उदाहरण: अगर आप किसी ऐसे व्यक्ति से, जो कभी स्कूल नहीं गया हो, यह पूछें कि “अगर मैं एक पत्थर हवा में उछालता हूँ तो क्या होगा?” तो वह कहेगा — “वो ज़मीन पर गिर जाएगा।” वह बिल्कुल सही कह रहा है, फिर भी वह अंधविश्वास ही कर रहा है। हमारे लिए यह अंधविश्वास नहीं है, क्योंकि हमने गुरुत्वाकर्षण का नियम पढ़ा है और पत्थर के ज़मीन पर गिरने का कारण जानते हैं। अब आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम सब अंधविश्वासी थे, हैं और रहेंगे भी। क्योंकि यही ज...
जहाँ हर कोई अपने खालीपन को भरने में लगा हैं, वहीं मैं खुद को खाली करने में लगा हूँ। मुझे खुद को खाली करना ही होगा—खाली जाति-पात से, खाली धर्म-समाज से, खाली अपनी पहचान से और खाली इस जहान से। क्योंकि जो कुछ भी मेरे अंदर है, वह अब मुझे बस कूड़ा-कचरा ही नजर आने लगा है। यह कचरा है झूठ का, दिखावे का, जलन का, क्रोध का, धर्म का और जाति का, लालच का और स्वार्थ का। और इस गंदगी के रहते मैं कितनी भी अच्छाइयाँ खुद में डालने की कोशिश करूँ, वे सब फिर गंदी हो जाती हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी घड़े में गंदा पानी भरा हो और हम उसमें अच्छा पानी भरते जाएँ, यह सोचकर कि एक दिन गंदा पानी साफ पानी से बदल जाएगा। लेकिन कुछ गंदगी इतनी मोटी और भारी होती है कि वह घड़े की तलहटी में ही बैठी रह जाती है। इसलिए घड़े को पहले पूरा खाली करना पड़ता है, पूरा पानी उलीचना पड़ता है, घड़े को उल्टा करना पड़ता है। फिर थोड़ा साफ पानी डालकर उसे धोना और फिर खाली करना पड़ता है। जरूरत पड़े तो उस घड़े को धूप में अच्छी तरह सुखाना भी पड़ता है, जिससे उसने जो गंदा पानी सोख रखा है, वह भी भाप बनकर उड़ जाए। मुझे भी खुद को वैसा ही खाली करना ...