जहाँ हर कोई अपने खालीपन को भरने में लगा हैं, वहीं मैं खुद को खाली करने में लगा हूँ।
मुझे खुद को खाली करना ही होगा—खाली जाति-पात से, खाली धर्म-समाज से, खाली अपनी पहचान से और खाली इस जहान से।
क्योंकि जो कुछ भी मेरे अंदर है, वह अब मुझे बस कूड़ा-कचरा ही नजर आने लगा है। यह कचरा है झूठ का, दिखावे का, जलन का, क्रोध का, धर्म का और जाति का, लालच का और स्वार्थ का।
और इस गंदगी के रहते मैं कितनी भी अच्छाइयाँ खुद में डालने की कोशिश करूँ, वे सब फिर गंदी हो जाती हैं। ठीक वैसे ही जैसे किसी घड़े में गंदा पानी भरा हो और हम उसमें अच्छा पानी भरते जाएँ, यह सोचकर कि एक दिन गंदा पानी साफ पानी से बदल जाएगा। लेकिन कुछ गंदगी इतनी मोटी और भारी होती है कि वह घड़े की तलहटी में ही बैठी रह जाती है।
इसलिए घड़े को पहले पूरा खाली करना पड़ता है, पूरा पानी उलीचना पड़ता है, घड़े को उल्टा करना पड़ता है। फिर थोड़ा साफ पानी डालकर उसे धोना और फिर खाली करना पड़ता है। जरूरत पड़े तो उस घड़े को धूप में अच्छी तरह सुखाना भी पड़ता है, जिससे उसने जो गंदा पानी सोख रखा है, वह भी भाप बनकर उड़ जाए।
मुझे भी खुद को वैसा ही खाली करना है और कड़ी धूप में सुखाना है। फिर खाली ही सही, लेकिन साफ तो हो जाऊँगा।
ज्ञान का साफ पानी मुझमें कब और कैसे भरेगा, मैं नहीं जानता। हो सकता है कभी कोई ज्ञान का बादल इस घड़े के ठीक ऊपर फटे और एक झटके में इसे पूरी तरह भर दे। या फिर हल्की-हल्की बारिश हो और बूँद-बूँद करके बरसों में भी थोड़ा-सा ही भर पाए। या बस मंद फुहार जो मुझे बाहर से ही भींगो दे। या पूरी जिंदगी बारिश न हो और यह सूखा-खाली ही रह जाए।
पर तब भी यह सूखा-खाली घड़ा उस घड़े से बेहतर होगा जो गंदे पानी से भरा था—जिसकी तलहटी में कचरा जमा था, जिसमें कीड़े पनपने लगे थे और जिसका पानी बदबूदार हो गया था।
मैं खुद को खाली करना चाहता हूँ।
मैं सूखे घड़े सा हो जाना चाहता हूँ।
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